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धर्म का मर्म |

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धन तो हाथ का मैल, धोए तो हाथ साफ़ सुथरे, गंगा नहाने से पाप धुल जाते हैं, ईसा मसीह के पास जाने से अपराध क्षमा हो जाते हैं और हज करने पर गुनाह माफ़ हो जाते हैं | बार – बार पाप करो और फिर माफ़ करवा लो | तो भारत सदियों से विश्व भर के भटके पथिकों की आध्यात्मिक शिक्षा और सुख-शांति का उपदेश देता रहा है। क्या ईश्वर न्यायकारी नहीं है और भेद-भाव और पक्षपात करता है | मजहब तो ब्रैंड हैं जो इंसान को इंसान से जुदा करते हैं और लड़वाते हैं |
“नफरत की दुनिया को छोड़ के प्यार की दुनिया में ….
खुश रहना मेरे यार” अमर रहे तेरा प्यार |
त्याज्य रूढ़ियों से बाहर निकल हम सबको सब से पहली, पुराणी और शुद्ध -पवित्र अपनी मूल वैदिक आर्यन संस्कृति को पहचानो होगा | हमें अपने संस्कारों, मुल्यों और गारिमा की रक्षा के लिये विशिष्ट पहचान वाली वैदिक सभ्यता के अनुसार चरित्र का निर्माण करना होगा | एक वैदिक आर्यन संस्कृति ही कहती है की ‘ मनुर भव: ‘ अर्थात मनुष्य बन | इसके उलट ब्रांडेड सभ्यताएं तो कहती है मुसलमान – इसाई – बुद्धिस्ट बन |
ना हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा |
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा ||
भूमन्डलीकरण और संचार क्रांति के बाईप्रोडक्ट की इन्फ़ेक्शन से बचने के लिये है, हमें अपने संस्कारों ,मूल्यों और गरिमा की रक्षा करनी होगी और विशिष्ट पहचान वाली वैदिक सभ्यता को चरित्र निर्माण द्वारा फिर अपनाना होगा | इसमें ना केवल भारत का अपितु पूरी विश्व बिरादरी का लिये अत्यन्त घातक है कल्याण निहित है |
भारत सदियों से विश्व भर के भटके पथिकों की आध्यात्मिक शिक्षा और सुख-शांति का उपदेश देता रहा है।
आर्यावर्त अर्थात भारत देश अपनी आन्तरिक सांस्कृतिक पहचान को इस महामारी से बचाने के लिये बहुत पहले सजग हो चूका था | भारत सदियों से विश्व भर के भटके पथिकों की आध्यात्मिक शिक्षा और सुख-शांति का उपदेश देता रहा है।
एतद देश प्रसूतस्य सकाशादग्र जन्मना: |
स्वम स्वम चरित्रेन शिक्षरेंण प्रिथ्व्याम सर्व मानवः |
संसार भर के लोग अपने – अपने चरित्र निर्माण के लिये भारत की और प्रस्थान करते थे | यह सोने की चिड़िया अपने अध्यात्मिक ज्ञान से सब आनेवालो को स्वर्णिम अर्थात सोने के वर्णवाला कर देती थी | यहूदी हों, इस्साई यां फिर मुसलमान, उनके मजहब यां उनके भी अलग – अलग ब्रांडों में कोई भी ऐसे नये मानवीय मुल्य यां मर्यादें नहीं हैं जो वेदों में नहीं | हाँ यह सच है की स्वार्थ, पक्षपात और अविद्या -अज्ञान के कारण हिन्दुयों के बहुत से मत – मतान्तर बन गये और उनमें बहुत सी बुराइयाँ और त्रुटियाँ घर कर गई | रानी थी वोह दासी हो गई दासी थी वोह रानी हो गई | परमपिता परमात्मा को छोड़ प्राकृतिक वस्तुओं और पाखण्ड की की पूजा होने लग गई | इससे हिन्दू बंटते चले गये और उनकी आर्यन – सभ्यता का भी ह्रास होता चला गया | सभी मत -मजहब भाईचारे का सन्देश देते हैं, फिर भी भाई – भाई से दूर होता चला जा रहा है और गैरों पे कर्म अपनों पे सितम ढा रहा है |
भारत मानव सभ्यता ने सामाजिक ढाँचे को मर्यादों में बाँधा और वर्जित कर्मों का निषेद किया | मानव सभ्यता के मूल्य ही आज अनिवार्य अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार हैं | मनुष्य का असली वस्त्र तो उसका चरित्र होता है | सभ्यता, शालीनता और नैतिकता के लिये मनुष्यों के लिये वस्त्र पहनना आवश्यक हैं | क्या बुर्के यां परदे में ढकी औरत यां लड़की को देख कोई उसके चाल-चलन के बारे में बता सकता है | हो सकता है की वोह किसी अच्छे परिवार -खानदान से हो यां फिर आफत और दुनिया की मारी जिस्म बेचकर परिवार का गुजरा करने वाली कोई बेबस दुखिया अबला औरत |
दुसरे प्राणियों की भांति मनुष्य योनी में भी भोग अर्थात यौनिक संस्कार भी निहित हैं, इस लिये वस्त्र पहनना सभ्य होने की पहचान है | नंगापन यां यौनिक अंगो का प्रदर्शन पशुता की पहचान है | सभ्य लोग दूसरों की बहु – बेटियों को बुरी निगाह से नहीं देखते | निगाहे नेक होनी चाहिये | अपनी नज़रों में बुराई के लिये हम दुसरे को दोषी नहीं ठहरा सकते |

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepaksharmakuluvi के द्वारा
September 13, 2012

WONDERFUL SIR……….

dineshaastik के द्वारा
July 30, 2012

आदरणीय शर्मा जी, सादर नमस्कार। सामान्यतः ऐसे विषयों पर लिखे आलेखों से मेरी सहमति नहीं होती। लेकिन आलके इस आलेख से में सहमति रखता हूँ। इस संबंध में आप मेरे कुछ आलेख पढ़कर मार्गदर्शन करेंगे तो मुझे खुशी होगी।


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