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सुलगते परिवार और खापों के फरमान |

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दुखों का सब से बड़ा कारण अविद्या ( IGNORANCE ) है | पंचायतों यां खापों को ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत मान और सम्मान होता है और होना भी चाहिये, परन्तु उन्हें भी बदलते जमाने और समय के साथ – साथ बदलना भी चाहिए और दूरदर्शी होना चाहिए | कभी किसी पति – पत्नी की हत्या कर देना यां ज़बरदस्ती उनको अलग -अलग कर देना एक सामाजिक कलंक ही नहीं अपितु एक एक घिनोना अपराध भी है | खापों के फैसलों से बहुत से परिवार सुलग रहें हैं और बहुत से परिवारों के बेटे सजा भुगत रहे हैं, मां – बहने आंसू बहा रही हैं और अंदर ही अंदर व्यथित है, घुल रही हैं | एक तरफ तो बेटी को मार दिया और दूसरी तरफ बेटा जेल में फांसी यां उम्रक़ैद का इंतजार कर रहा है | ऐसी झूठी इज्ज़त के क्या मायने और क्या नतीजा | गांववालों को ऐसी शादी में घरवालों का व्यंग, नुक्ताचीनी ताने, उल्हाने नहीं देने चाहिये और उकसाना नहीं चाहिये बल्कि समझाना चाहिये की ‘जो हो गया सो हो गया”| नियति को यही मंज़ूर था | ” बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध ले ” | चालीस वर्ष तक की औरतों को घर से निकलना और मोबाइल फोन का इस्तेमाल वर्जित है | ऐसा है तो बीमारी में चालीस वर्ष तक की डाक्टर से भी ना मिलें और महिला अधिकारी से भी अपनी समस्या का जिकर यां शिकायत ना करें | कैसी दकियानूसी है, क्या अंधेरगर्दी है | कि ससुर इज्ज़त लूट कर पत्ति बन गया और पत्ति बेटा |

चाहे राजनितिक कारण रहें हों, महाभारत में मामों की पुत्रियों – अर्जुन का सुभद्रा से, कृष्णपुत्र प्रद्युमन का रुक्मण की बेटी से और अभिमन्यु का उत्तरा से विवाह हुआ | फिर बिना रिश्तेदारी के और आपसी पसंद से कोई अच्छा सम्बन्ध हो जाता है तो माता -पिता को संकुंचित विचार त्याग ऐसे विवाह के लिये स्वीकृति दे देनी चाहिए और अगर दिलो – दिमाग में नफरत है विवाहित जोड़े को उनके हाल पर छोड़ देना चाहिये | लड़के और लड़की को भी समाज में परिवारों कि मान – मर्यादा और सम्मान का ध्यान रखना चाहिए |

अगर कोई एक दुसरे को पसंद कर शादी करता है तो यह कोई पाप नहीं है | कहावत भी है की मियां – बीबी राज़ी तो क्या करेगा काजी | इस्लाम में तो लड़का – लड़की की निकाह के वक़्त पूछा जाता है मंजूर – मंज़ूर | विवाहित जोड़े को पूरा जीवन साथ निभाना होता है, इसलिए उनका एक दुसरे को समझना, आपसी सहमति और प्यार आवश्यक है | हम बने तुम बने एक दूजे के लिए – यह गाना भी औरत – मर्द का जीवन भर का साथ निभाने का आदर्श दर्शाता है | आम तौर पर देखा गया है कि डाक्टर की डाक्टर से, टीचर की टीचर से, लेक्चरार की लेक्चरार, किसान की किसान से शादी अधिक सफल होती है| एक दुसरे की सहमति के बिना विवाह बंधन यां तो अधिकतर टूट जाते हैं यां अनबन और दुःख – कलेश का कारण बन जाते हैं | उनके नजदिकी भी उनके दुःख से दुखी रहते हैं और उनके बच्चे भी माँ -बाप के झगडे और दूरी से बचे नहीं रह पाते और कई तरह की मानसिक व्याधियां उनके बच्चपन को ही नहीं पूरे जीवन को लील लेती है |
मैं इन ‘घर के कानून’ बनाने वालों से पूछता हूँ की जब किसी जख्मी यां किसी को आपरेशन के वक़्त खून की आवश्यकता पड़ती है तो यह किसी खून की बोतल पर यह नहीं लिखा होता की खून हिन्दू, मसलमान यां किसी इस्साई का था, यां अंग्रेज, हिन्दोस्तानी, नीग्रो का, यां फिर ब्राह्मण, बनिया, क्षत्री, जाट, गुज्जर, प्रजापति, चमार यां बाल्मीकी का, यां देसी यां विदेशी का |
बुजुर्गों का भी सोचने का ढंग पूरा गलत नहीं है, कि हम अपने पुत्र – पुत्रियों को प्यार से और खर्च करके शिक्षा ग्रहण करने भेजते हैं ना कि इश्क करने के लिये | इस लिये जैसा की स्वामी दयानंद वेदवाणी की अनुसार कहते है की लड़के -लड़कियों पाठशालायें – कालेज कम से कम एक दुसरे से दो कोस दूर होने चाहिये, तांकि वह योन आकर्षण से दूर शिक्षा ग्रहण करें | विद्यार्थियों के टीचर – लेक्चरार और दूसरा स्टाफ भी उनी के लिंग के होने चाहिये |
मुझे याद है कि अहमदाबाद की इन्जनीरिंग इंस्टिट्यूट में मेरी भांजी को एक इन्जनीरिंग कर चुका लड़का दोस्ती के लिये दबाव डाल रहा था और तंग कर रहा था | उसके अध्यापक के द्वारा ही मैंने उसे सूचित कर दिया की हम अपनी बेटियों को पढने के लिये भेजते हैं इश्क़ करने के लिये नहीं और अगर दुबारा उसने सम्पर्क करने की कोशिश की तो यह उसकी सेहत के लिये ख़राब होगा |
संस्कारों की शिक्षा ही आज के रिश्तों और सम्बन्धो में सुधार ला सकती हैं | वेद कहता है – जन्मना अजायते शूद्रः जनम से सभी शुद्र होते हैं संस्कारात द्विज उच्यतें | जन्म से सभी शुद्र होते हैं और ज्ञान और विद्या ही व्यक्ति को ऊंची कैटेगरी अर्थात जाती दिलवाते हैं | थोडा पढ़ा – लिखा भी व्यापार कर लेता है, शक्तिशाली पहलवान, अथ्लीट, यां खिलाडी और सैनिक, पुलिसमैन यां नेता भी बन सकता है | और अधिक पढा – लिखा अध्यापक, वैध – डाक्टर, साइंसदान बन सकता है | आपको कोई बिमारी यां अक्सिडेंट हो गया हो तो आप कभी भी डाक्टर की जाती -पाती नहीं पूछते | आवाज दो हम एक हैं | आओ जाती – पाती से ऊपर उठें और गाँव – गाँव, जनपदों, राज्यों और अपने देश – राष्ट्र को भी ऊँचा उठायें |
वयम राष्ट्र जाग्रयाम पुरोहित: | आओ हम सब राष्ट्र जाग्रति के प्रहरी बने | इंसान बनो करलो भलाई का कोई काम इन्सान बनो | इन्सानियत से बढ़के कोई मज़हब नहीं |
ना हिदू बनेगा ना मुसलमान बनेगा,
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा |
वेद भी यही कहता है मनुर भव: | केवल मनुष्य जन्म से मनुष्य नहीं बनता मनुष्यता के संस्कारों से ही मनुष्य – मनुष्य बनता है | आज लोग महापुरुषों को भगवान्, मसीहा यां मैसेंजर के नाम से क्यों याद करते हैं, इसलिये कि उन्हों ने मानवता – इंसानियत के लिये महान कार्य किये थे | आवाज दो हम एक हैं | आओ हम भी मानवता के लिये कुछ करें |

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashishgonda के द्वारा
July 16, 2012

पूरा लेख शीर्षक से मिलता हुआ, बहुत ही जरूरी विषय आपने हामरे सामने रखा. धन्यवाद. http://ashishgonda.jagranjunction.com/

dineshaastik के द्वारा
July 15, 2012

आदरणीय शर्मा जी आपके विचारों से पूर्णतः सहमत… बहुत ही सराहनीय आलेख……

nishamittal के द्वारा
July 15, 2012

सामजिक समस्याओं का समाधान आवश्यक है,परन्तु विकल्प ये फरमान कदापि नहीं हो सकते


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